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चोल सम्राज्य का प्रशासनिक व्यवस्था,चोल साम्राज्य का अंत@2021


दोस्तों आप का स्वागत है हमारे Achiverce Information में  तो आज का हम आपको बताने जा रहे चोल सम्राज्य का प्रशासनिक व्यवस्था, चोल सम्राज्य का अंत, चोल सम्राज्य के पतन के कारण,तथा चोल वंश का अंतिम शासक कौन है? इन सभी विषय पर हमने इस पोस्ट जानकारी देने का प्रयास किया है। 

चोल सम्राज्य का प्रशासनिक व्यवस्था


चोल सम्राज्य का आरम्भ किसने किया? 

चोल साम्राज्य दक्षिण भारत  का एक राजवंश था जिसके शासकों ने लगभग 9 वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के मध्य एक शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य का निर्माण किया था।

इतिहासकारों के अनुसार चोल वंश के संस्थापक विजयालय (850 - 871 ई०) ने किया था जो पल्लव अधीनता में उरैथुर प्रदेश का शासक था।इतिहासकारों के मुताबिक विजयालय की वंश परंपरा में लगभग 20 राजा हुए।विजयालय के  चोल बाद चोल साम्राज्य का शासन आदित्य प्रथम ने किया जो (871-907) तक चोल साम्राज्य पर शासना किया। आदित्य प्रथम के बाद के परातक प्रथम ने (907 - 955 ) तक चोल पर शासन किया। चोल को शक्तिशाली और साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक परांतक ही था क्योंकि इसी ने चोल साम्राज्य कई देशों में विस्तार किया।


परन्तु परंतक ने लकांपति उदय (945-53 ई.) के समय में सिंहल पर आक्रमण किया इसके पश्चात परांतक ने अपने अंतिम दिनों में राष्ट्रकूत सम्राट कृष्णा तृतीय द्वारा 949 ई. मे आक्रमण किया इस आक्रमण में परांतक बुरी तरह पराजित हुआ इस पराजय के फलस्वरूप चोल साम्राज्य की नीव हिल गई  परांतक प्रथम के बाद के 32 वर्षा में कई चोल शासकों ने शासन किया

चोल सम्राज्य का प्रशासनिक व्यवस्था

 चोल अपने प्रशासन के लिए दक्षिण भारत के इतिहास में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। चोल प्रशासन की जानकारी वत्कालीन साहित्य तथा चाले सम्राटों के अभिलेखों से प्राप्त होती है। चोल प्रशासन अत्यंत समृद्ध और व्यवस्थित था ।

 1. केंद्रीय प्रशासन 

चोलों के केंद्रीय प्रशासन में भी सम्राट को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। उसका पद पैतृक होता था सम्राट का प्रमुख कर्तव्य आंतरिक व्यवस्था करना और प्रजा की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना होता था। इसके अलावा साम्राज्य विस्तार करना भी राजा का प्रमुख कर्तव्य माना जाता था। राजा के अधिकार असीमित होते थे। 

राजा मंत्रियों तथा अन्य मुख्य अधिकारियों की सहायता से शासन चलाता था। केंद्रीय शासन को विभिन्न विभागों में बाँटा गया था, जिनका संचालन सहायता से अलग-अलग अधिकारी करते थे। सम्राट हमेशा सचेत रहता था। वह स्वयं सरकार के प्रत्येक भाग की देखभाल करता था। राजकुमारों के लिए अनिवार्य सैनिक व्यवस्था थी। 

राजकीय परिवार के प्रत्येक लोग शासन में भाग लेते थे। राजा निरंकुश होते हुए भी प्रजा हितकारी होता था। वह जाति, धर्म, व्यवसाय तथा प्रशासकीय संस्थाओं के निर्णय का ध्यान रखता था। चोल प्रशासन अधिक केंद्रीय था।

2. मैत्री तथा अन्य अधिकारी  

राजा की साहायता के लिए मंत्री और अन्य अधिकारी भी थे परंतु इनके सम्बन्ध में स्पष्ट उल्लेख नहीं प्राप्त होता है। अभिलेखों में औलेनायक और पेरूंदरम का उल्लेख है जो राजा की आज्ञा को कहीं भेजने से पहले राजाज्ञा पर हस्ताक्षर करते थे।

 राजमहल में भी विभिन्न नामों वाले अनेक कर्मचारी तथा अंगरक्षक आदि होते थे महल में प्रायः महिलायें कार्य करती थीं। सम्भवतः वे रोजा का मनोरंजन भी करती थीं।

 चीनी लेखक चाउ-जु-कुआं लिखता है-"राजकीय भोजों के अवसर पर राजा और उसके दरबार के चार मंत्री राजसिंहासन के नीचे खड़े होकर सलाम करते हैं... अपने मजे के लिए तथा अनुरक्षक के रूप में कार्य करने के लिए हजारों नाचने वाली लड़कियाँ नियुक्त कर रखी है।" वस्तुतः चोल प्रशासन में विभिन्न स्तरों के अधिकारी थे। ये लोग दो श्रेणियों 'पेसंदरम' और 'शिरूदनम' में विभक्त थे। 

3. साम्राज्य का विभाजन 

सम्पूर्ण साम्राज्य अनेक मंडलों में विभाजित था। प्रत्येक मंडल में अनेक कोट्टम (बड़े प्रदेश) होते थे। प्रत्येक कोट्टम अनेक नाडुओं में विभाजित था। नाडू में अनेक कुर्रम (ग्राम समूह) होते थे। कुंम में अनेक नगर और ग्राम होते थे। मंडल का शासन राजा द्वारा नियुक्त वायसराय के द्वारा होता था।

 वह वायसराय राजकुमार, राजवंशीय अथवा कोई बड़ा सामंत होता था। प्राप्त प्रमाणों से पता चलता है कि प्रत्येक इकाई में वहाँ की जनता का भी सहयोग होता था। मंडल से लेकर ग्राम तक स्थानीय सभाएँ होती थी। नाडु की कथा का नाम 'नाट्टर' और नगर की सभा का नाम 'जगस्तार' था।

इसी प्रकार ग्राम (उर) में 'उरार' नामक सभा होती थी। ब्राह्मणों को दान में दिये गये ग्राम 'चतुर्वेदी-मंगलम्' कहलाते थे। इनका प्रबंध 'सभा' के द्वारा होता था। व्यवसायियों और शिल्पियों की अपनी सभाएँ थीं। इन्हें 'श्रेणी' और 'पूग' कहते थे। प्रशासन में इनका भी सहयोग लिया जाता था।

4. स्थानीय शासन 

चोल शासन की एक प्रमुख विशेषता उसके ग्रामों का स्थानीय शासन था। इन समितियों को 'वैरियम' कहते थे। प्रत्येक समिति में निर्वाचित सदस्य होते थे। निर्वाचन के लिए ग्राम प्रायः 30 वार्डों में विभाजित था। निर्वाचित सदस्यों से ही ग्राम की स्थाई समिति, उपवनसमिति, तडाक-समिति, कृषि समिति, न्याय समिति आदि अनेक प्रशासन समितियाँ बनायी जाती थीं।

इसके सदस्यों को वेदों एवं अन्य ब्राह्मण ग्रंथों का या 1/3 के हिस्से से अधिक भूमि का स्वामित्व और एक वेद तथा एक भाष्य का ज्ञान होना आवश्यक था। यदि वह किसी बात को गुप्त रखता था तो उसे सदस्यता से हटा दिया जाता था।

चुनाव लाट प्रथा (Lot System) के द्वारा सदस्यों का चुनाव होता था। सभी उम्मीदवारों के नाम अलग-अलग पत्तियों पर लिखे जाते थे। वे पत्तियाँ एक बर्तन में डालकर बर्तन हिला दिया जाता था। इसके पश्चात कोई बालक निश्चित संख्या में पत्तियों को निकालता था जिन लोगों के नाम की पत्तियाँ निकल आती थीं वे निर्वाचित समझे जाते थे।

5. ग्राम सभाओं के कार्य  

गाँवों के विकास के लिए ग्राम सभाएँ विभिन्न प्रकार का कार्य करती थीं। वे गाँवों में सिंचाई का प्रबंध करती थीं। गाँव का भूमिकर एकत्र कर के राजकोष में जमा करती थीं गाँव के झगड़ों का निपटारा भी वह स्वयं करती थी। मंदिर के प्रबंध का कार्य भी वही करती थीं। गाँवों में उन्हीं के द्वारा बाजार का प्रबंध किया जाता था।

 ग्राम सभाओं के पास एक सहायता कोष भी होता था। इससे आपत्तिकाल में लोगों की सहायता की जाती थी। सड़कों का निर्माण तथा उसकी देखभाल ग्रामसभा ही करती थी। यह शिक्षा के लिए पाठशालाओं का भी प्रबंध करती थी। लोगों की स्वास्थ्य की रक्षा का प्रबंध करना भी उसका कार्य था। इसके लिए अस्पताल आदि बनवाती थी।

यद्यपि ग्राम संभायें अपने कार्य के लिए स्वतंत्र थीं, फिर भी राज्य उनके कार्यों पर दृष्टि रखता था और उनकी सहायता करने के लिए वह ग्रामों में अपने अधिकारी नियुक्त करता था। यदि अधिकारी ग्राम सभाओं के कार्यों में कोई गड़बड़ी देखते थे तो उसकी सूचना राजा को देते थे। राजा उनके विरुद्ध आवश्यक कार्यवाही करता था। एक उल्लेख के अनुसार एक बार एक मंदिर की आय का दुरुपयोग करने के अपराध में राजा ने ग्राम सभा पर जुर्माना किया था। अनेक कार्यों में ग्राम को राजाज्ञा लेनी पड़ती थी।

6. राजस्व व्यवस्था 

चोल वंश की आय का मुख्य साधन भूमिकर था जो उपज का 1/6 भाग होता था। अकाल या बाढ़ की दशा में भूमिकर माफ कर दिया जाता था। भूमिकर (लगान) नकद या अनाज के रूप में दिया जा सकता था। भूमिकर के अलावा सरकार को चुंगी, नमक कर, जल कर और जुर्माने आदि भी पर्याप्त आमदनी होती थी। इन करों से प्राप्त धन शासन चलाने तथा जनहित कार्य करने में खर्च किया जाता था।

7. प्रजा हितकारी कार्य 

चोल शासक प्रजाहितकारी शासक थे। प्रजा की भलाई के लिए वे विभिन्न प्रकार का कार्य करते थे। वे समय-समय पर राज्य में घूमा करते थे। वे किसानों के लिए सिंचाई का प्रबंध करते थे। उन्होंने अनेक तालाब, कुएं, झीलें, बांध और नहरों आदि का निर्माण करवाया था आवागमन की सुविधा के लिए सड़कें बनवायी थीं। इसके अलावा अनेक भवन, मंदिर और पुल आदि बनवाये।

8 . सैनिक व्यवस्था 

चोलों के पास एक स्थाई सेना होती थीं। इसमें पैदल, घुड़सवार हाथी आदि होते थे। सम्पूर्ण, हाथी होते थे। सम्पूर्ण सेना की संख्या 1,50,000 थी। इसमें 60 हजार केवल हाथी थे घोड़े बाहर से मंगवाये जाते थे। सेना में अनेक दल थे जिनमें राजा का अंगरक्षक पदाति दद, चुने हुए अश्वारोहीः हाथियों का दल और धनुर्धारियों का दल था।

सेना छावनी में रखती थी। सैनिकों को उत्तम कोटि का प्रशिक्षण दिया जाता था। उल्लेखनीय है कि सेना नागरिक सेवा भी करती थी युद्धकाल में राजा स्वयं सेना का चालन करता था। सेनापति महादंडनायक कहलाता था। उसके अधीन टुकड़ियों के नायक होते थे।

उल्लेखनीय है कि चोलों के पास नौसेना, जहाजी बेड़ा भी था इसी की सहायता से चोलों ने चेरों की नौसेना को नष्ट कर दिया। राजराज प्रथम और राजेंद्र चोल ने इसी के बल पर अनेक विजय हासिल की। चोल साम्राज्य में अनेक व्यापारी जहाज भी थे ये दूर-दूर के देशों के साथ सामुद्रिक व्यापार करते थे।इस प्रकार चोलों की शासन व्यवस्था अत्यंत सुदृढ़ और संगठित थी नीलकंठ शास्त्री इसकी प्रशस्त करते हुए कहते हैं। 

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चोल सम्राज्य के पतन के कारण

चोल वंश का अंतिम राजा राजेद्र तृतीय हुआ, आरंम्भ मे राजेद्र को पांड्यों पर आक्रमण करने से आंशिक सफलता मिली परंतु चोल साम्राज्य में पाण्ड्य को चोल राजवंश की निर्बलता का पता चल गया जिसका लाभ उठाकर पाण्ड्या ने दक्षिण में केरल,छत्तीसगढ़,श्रीलंका, आदि क्षेत्रो में विद्रोह की भावना पैदा कर दी इस विद्रोह से चोल सीमा धीरे-धीरे कम होने लगी इसी अवसर का लाभ पाण्डया ने उठाया और चोल वंश को पाण्ड्य शासक ने हरा दिया इस कारण चोल शासन का अंत हो गया। 

चोल वंश के वंशावली शासक क्रम अनुसार:-

विजयालय चोल (848-871 ई ०)

आदित्य  (871-907 ई ०)

परन्तक चोल  (907-950 ई ०)

गंधरादित्य (950-957 ई ०)

अरिंजय चोल (956-957 ई ०)

सुन्दर चोल (957-970 ई ०)

उत्तम चोल (970-985 ई ०)

राजाराज चोल (985-1014 ई ०)

राजेन्द्र चोल ( 1012-1044 ई ०)

राजाधिराज चोल ( 1044-1054 ई ०)

राजेन्द्र चोल (1054-1063 ई ०)

वीरराजेन्द्र चोल (1063-1070 ई ०)

अधिराजेन्द्र चोल (1067-1070 ई ०)

कुलोतुंग चोल ( 1070-1120 ई ०)

कुलोतुंग चोल (1133-1150 ई ०)

राजाराज चोल ( 1146-1163 ई ०)

राजाधिराज चोल ( 1163-1178 ई ०)

कुलोतुंग चोल ( 1178-1218 ई ०)

राजाराज चोल ( 1216-1256 ई ०)

राजेन्द्र चोल ( 1246-1279 ई ०)

चोल साम्राज्य का राज्य जो वर्तमान में इन देशों का हिस्सा है।

भारत, श्रीलंका, बांग्लादेश, बर्मा, थाइलैण्ड, मलेशिया, कंबोरिया,वैयतनाम,इण्डोनिशिया, सिंगापुर,मालद्वीप, आदि।

निष्कर्ष = उपरोक्त बातों से यह पता चलता है कि चोल सुम्राज्य ने लगभग 400 वर्ष तक शासन किया और इसका प्रशासनिक प्रणाली काफी मजबूत और शक्तिशाली था,तथा उन्होंने उपने शासन के दौरान कई मन्दिसे मंदिरों का निर्माण किया जो तजौर, बृहदीश्वर मंदिर आदि शामिल हैं तथा अतिरिक्त विद्रोह के कारण चोल वंश का अंत हो गया। 

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