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भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत और उनका समाज में योगदान@2021

आपका स्वागत है हमारे Achiverce Information में तो इस पोस्ट में आपको बताने जा रहे भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत, इन संतो ने भक्ति आंदोलन में किस प्रकार अपना योगदान दिया है। इस विषय पर हमने इस पोस्ट में जानकारी देने का प्रयास किया है।  इससे पहले मैंने एक और पोस्ट लिखीं है  भक्ति आंदोलन का क्या अर्थ है आप उसे भी जरूर पढ़ें। 

भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत


भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत


 भक्ति आंदोलन का जन्म दक्षिण भारत में हुआ। परंतु धीरे-धीरे यह आंदोलन सम्पूर्ण भारत में फैल गया। इस आंदोलन में अनेक लोगों ने भाग लिया।


1. शंकराचार्य 


 भक्ति आंदोलन की नींव शंकराचार्य ने रखी। इनका जन्म 788 ई. में काल्दी (मालाबार) नामक स्थान पर ब्राह्मण परिवार में हुआ ये बचपन से ही प्रतिभाशाली थे। ये वेदांत दर्शन में बहुत अधिक रुचि रखते थे। ये एकेश्वरवाद में विश्वास रखते थे। 820 ई. में इनकी मृत्यु हो गयी।


2. रामानुज 


 12वीं शताब्दी के इस संत का जन्म आंध्र प्रदेश में त्रिपुती नामक स्थान पर हुआ था। इन्होंने दक्षिण भारत में वैष्णव धर्म का प्रचार किया। इन्होंने शंकराचार्य के अद्वैतवाद तथा मायावाद का विरोध किया। इन्होंने भक्ति तथा प्रेम पर अधिक बल दिया। इनका कहना था कि बिना भक्ति के मोक्ष सम्भव नहीं है। ये उदार व्यक्ति थे और इन्होंने शूद्रों की स्थिति को ऊँचा उठाने का प्रयास किया।


3. नामदेव 


 इन्होंने महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का प्रचार किया। नामदेव ने मूर्तिपूजा, रुढ़िवाद और कोरे सिद्धांतों का खुलकर विरोध किया। सम्पूर्ण दक्षिण में भक्ति आंदोलन का श्रेय नामदेव को दिया जाता है। उन्होंने स्त्रियों की प्रगति, भाईचारे की भावना और हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।


4. रामानंद 


उत्तरी भारत में रामानंद ने भक्ति आंदोलन की शुरुआत की। वे रामानुज के शिष्य थे। उन्होंने राम और सीता की भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने भी जाति-पाति का विरोध किया। उनके कई प्रसिद्ध भक्त हुए जैसे रविदास, कबीर आदि ।


5. चैतन्य 


 इन्होंने बंगाल और उत्तरी भारत में भक्ति आंदोलन का प्रचार किया। वे कृष्णा भक्ति शाखा के संत थे। उनका जन्म 1486 ई. में पश्चिमी बंगाल में नदिया नामक स्थान पर हुआ। उन्होंने बचपन में संस्कृत का अध्ययन किया। वे कृष्ण भक्ति में लीन रहते थे और भजन-कीर्तन किया करते थे। नदिया के काजी द्वारा भजन कीर्तन पर प्रतिबंध लगाने पर उसके निवास पर देर तक कीर्तन करते रहे। अंत में काजी को झुकना पड़ा।

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भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत


6. कबीरदास 


आरम्भिक जीवन-कबीर भारत के महान संत और समाज सुधारक माने जाते हैं। उन्होंने तत्कालीन समाज की बुराइयों पर कुठाराघात किया। हिंदू-मुसलमानों में एकता स्थापित करना उसका मुख्य लक्ष्य था। उनके जन्म के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद हैं। एक सामान्य अनुभूति के अनुसार उसका जन्म 1425 ई. वारणासी में हुआ था।


 वे एक विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे। लोक लज्जा के भय से ब्राह्मणी ने वाराणासी में जन्म लेते ' ही लहरतारा नामक तालाब के पास फेंक दिया। उधर से गुजरने वाले एक मुसलमान नीमा ने उन्हें उठा लिया। उसकी पत्नी नीरू और उसने मिलकर उनका पालन पोषण किया। ये जुलाहे थे, इसलिए बड़े होने पर कबीर ने उनके व्यवसाय को अपना लिया। उन्होंने अपनी कोई जाति को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपनी कविताओं में अपने को बार-बार जुलाहा कहा है परंतु मुसलमान का संकेत कहीं नहीं दिया।


 बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा नहीं हुई। वे स्वयं लिखते हैं- 'मसि कागद छुआ नहीं, कलम गह्यो नहीं हाथ अनेक विद्वानों ने यह स्वीकार किया है कि उनका कोई गुरु नहीं था। परंतु यह उचित प्रतीत नहीं होता। डॉ. राजकुमार वर्मा और डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी का कहना है कि रामानंद उनके गुरु थे। प्रारम्भ में इन्होंने गुरु बनने से इंकार कर दिया। पर कबीर के विशेष आग्रह के कारण उन्हें शिष्य बनाना पड़ा। इसके अलावा गोसाई अष्टानंद, सूफी संत शेखतकी आदि से भी ज्ञान प्राप्त किया।


कबीर एक घुमक्कड़ और स्वतंत्र विचारों के संत थे। उन्होंने सम्पूर्ण भारत की यात्रा की। सम्भवतः इसीलिए उनकी भाषा खिचड़ी हो गयी है। आत्मिक ज्ञान और राम भक्ति में उनकी बहुत अधिक रुचि थी।


कबीर की शिक्षायें  : कबीर ने समाज सुधार और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए जो कुछ कहा वहीं उनकी शिक्षायें हैं।


(i) कबीर एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे। उनका कहना है कि ईश्वर एक है और उसे राम रहीम, अल्लाह, साई, साहिब आदि नामों से पुकारा जाता है।


 (ii) कबीर ने भक्ति मार्ग पर अधिक जोर दिया। उनके अनुसार ज्ञान और कर्म मार्ग अधिक कठिन है। बिना भक्ति के ईश्वर को नहीं प्राप्त किया जा सकता है। भक्ति के सामने जप, तप, संयम, ध्यान, तीर्थ आदि सभी व्यर्थ हैं।

(iii) उनका कहना था कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी ईश्वर स्मरण करना चाहिए। वे अपने जीवन के अंत तक गृहस्थ जीवन में रहे। पुस्तकीय ज्ञान को उन्होंने व्यर्थ बताया ।

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(iv) वे ईश्वर के निराकार स्वरूप को मानते थे। वे कहा करते थे कि ईश्वर सर्वव्यापक, सर्वत्र, सर्वरूप और सर्वशक्तिमान है। उसके लिए मंदिर और तीर्थस्थान की आवश्यकता नहीं है।


(v) वे हिंदू और मुसलमान दोनों की रूढ़ियों, अंधविश्वासों, नमाज और पूजा आदि

के विरोधी थे। अनेक स्थानों पर इन पर कठोर प्रहार किया है। मूर्तिपूजा का खंडन करते हुए उन्होंने कहा है 


पावर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार। 

ताते तो चक्की भली, पीस खाय संसार।

 

इसी प्रकार वे मस्जिद को व्यर्थ बताते हैं


कांकर पायर जोरि के, मसजिद लई बनाय।

 ता चाढ़ि मुल्ला बाग दे, बहरा हुआ खुदाय ॥ 


(vi) वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के बहुत बड़े समर्थक थे। उनको धर्म के नाम पर हिन्दू-मुसलमानों का संघर्ष पसन्द नहीं था। वे दोनों में एक-दूसरे के लिए सहयोग की भावना उत्पन्न करना चाहते थे। उन्होंने दोनों के बारे में कहा था 

“अने इन दोउन राह न पाई।

हिन्दुबवत की हिन्दुबाई देखी, देखी तुरकन की तुरकाई।"


(vil) वे अपने गुरु रामानंद के समान जाति प्रथा के विरोधी थे। वे सच्चे मानवतावादीथे और सबको समझते थे। इस कार्य में कबीर का साहस प्रकट होता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इसका विरोध किया। वे भक्ति को सच्चा मापदंड मानते थे। उनका कहना था कि भक्त की कोई जाति नहीं होती


जाति न पूछो साधू की, पूछि लीतियो ज्ञान । 

मोल करो तलवार का, चढ़त रहत तो म्यान ॥ 


(vill) केवीर हिंसा के प्रबल विरोधी थे। हिंसा पर कुठारघात करते हुए उन्होंने लिखा है-


 बकरी पाती खात है ताकी काढ़ी खात। 

जो बकरी को खात है, तिसको कौन हवाल ॥


 (ix) वे आर्थिक विषमता के विरोधी थे। उनके अनुसार प्रत्येक मनुष्य के पास इतना धन होना चाहिए कि वह आसानी से अपना जीवन यापन (व्यतीत) कर सके ।


7. गुरुनानक 


गुरुनानक की प्रमुख शिक्षायें निम्नलिखित थीं


 (i) गुरुनानक के अनुसार ईश्वर एक है। 


(ii) ईश्वर सभी जगह व्याप्त है।


(iii) उनके अनुसार जीव और आत्मा में घनिष्ठ सम्बन्ध है; जीव परमात्मा में उत्पन्न

होता है और जीव के अंदर परमात्मा का वास होता है। 


(iv) वे पथ प्रदर्शक के रूप में गुरू के महत्व स्वीकार करते हैं। चे गुरु और ईश्वर को समान मानते हैं।

(v) गुरुनानक भी बाहरी आडम्बरों से घृणा करते थे।


(vi) कबीर के समान गुरूनानक ने भी ग्रहस्थ जीवन में ही ईश्वर की प्राप्ति को सम्भव बताया।


(vil) वे भी हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। दोनों के मध्य भाई-चारे की भावना का विकास करना चाहते थे धर्म के नाम पर आपसी संघर्ष को उन्होंने व्यर्थ बताया।


(viii) वे हिंदू-मुसलमान, धनी-निर्धन, छोटा-बड़ा, उच्च-निम्न आदि में कोई भेदभाव नहीं मानते थे।


(ix) शिक्षा का प्रचार करने के लिए लंगर की प्रथा चलायी यह प्रथा सिक्खों में आज

भी विद्यमान है।


(x) गुरुनानक के अनुसार मनुष्य के जीवन का अंतिम लक्ष्य परम सुख की प्राप्ति है।

परम सुख प्राप्त करने वाले व्यक्ति को 'गुरु मुख' कहते हैं।


समाज पर गुरू नानक का प्रभाव


(i) नानक के उपदेशों से शताब्दियों से पद दलित निम्न जातियों को बंधनों से मुक्त होने की अपार प्रेरणा प्राप्त हुई। वस्तुतः कबीर की तरह नानक ने भी जाति प्रथा के विविध पक्षों पर घोर प्रहार किया।


(ii) उनके द्वारा हिंदू-मुसलमानों से समन्वय स्थापित हुआ। इसके लिए गुरूनानक ने मुस्लिम संतों का सतसंग प्राप्त किया। उन्होंने इस्लाम के उत्तम सिद्धांतों को अपनाया था।


(iii) उनके दृष्टिकोण की व्यापकता ने सिक्ख सम्प्रदाय को जन्म दिया, कवि धम्म ने लिखा है, "नानक ने सुधार के सिद्धांतों का बड़ी सूक्ष्मता के साथ साक्षात्कार किया और ऐसे व्यापक आधार पर नींव रखी, जिसके द्वारा गुरु गोविंद सिंह ने अपने देशवासियों में एक नवीन राष्ट्रीयता की भावना को जन्म दिया।"


 (iv) नानक के प्रभाव से सिक्खों के साथ-साथ देश को नई दिशा प्राप्त हुई। देश में समानता, बन्धुता, ईमानदारी तथा रचनात्मक श्रम के द्वारा जीविका पर आधारित नवीन समाज की स्थापना हुई।

निष्कर्ष:- उपरोक्त बातों से यह पता चलता है कि इस आंदोलन के संतों ने अपने अपने लेख के द्वारा ईश्वर से सच्ची श्रध्दा और भक्ति के बारे बताया है। 

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