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मनसबदारी व्यवस्था की विशेषताएं | Mansabdari System in hindi

मनसबदारी व्यवस्था की विशेषताएं | Mansabdari System in hindi

इस आर्टिकल में आपको बताने जा रहे मनसबदारी व्यवस्था की विशेषताएं Mansabdari System in hindi,मनसबदारी प्रणाली का अर्थ (Meaning of Mansabdari System),मनसबदारी प्रथा के गुण,मनसबदारी प्रथा के दोष आदि विषय पर हमने इस आर्टिकल में जानकारी देने का प्रयास किया है।

मनसबदारी प्रणाली का अर्थ|Meaning of Mansabdari System

मनसब अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है पद, स्थान या स्थिति अर्थात् मनसबदारी व्यवस्था या प्रणाली वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा राजदरबार में किसी भी अधिकारी वा कर्मचारी के पद, वेतन अथवा स्थिति का निर्धारण होता था। 

जिस व्यक्ति को सम्राट मनसव देता था उस व्यक्ति को मनसबदार कहा जाता था। प्रारम्भ में वह व्यवस्था सेना के लिए थी इसलिए मनसबदार को निश्चित संख्या में सेना रखनी पड़ती थी। प्रत्येक मनसबदार अपनी-अपनी श्रेणी और पद के अनुसार घुड़सवार सैनिक रखता था।

आगे चलकर गैर-सैनिक सेवाओं के लिए भी यह प्रथा शुरू कर दी गई, परंतु इन्हें निश्चित संख्या में सेनान रखना अनिवार्य नहीं था। काजी, सरदारों, कलाकारों और विद्वानों आदि को भी मनसब दिये जाते थे। इन पदों को जात और सवार नामक दो भागों में विभाजित किया गया था। इक्तादारी व्यवस्था क्या है? इक्ता प्रणाली UPSC 

मनसबदारी व्यवस्था की विशेषताएं
Mansabdari System in hindi


मनसबदारी व्यवस्था की प्रमुख विशेषतायें|Mansabdari System in hindi

मनसबदारों की नियुक्ति |Appointment of Mansabdars

मनसबदार के पद पर नियुक्त होने के लिए किसी विशिष्ट योग्यता की आवश्यकता नहीं थी। सम्राट किसी भी व्यक्ति को मनसबदार बना सकता था। प्रायः इसके लिए राजभक्ति देखी जाती थी। बड़े मनसब के लिए सदस्य का राजकीय परिवार से सम्बन्धित होना आवश्यकता था। बड़े और अमीर घरानों की वरीयता दी जाती थी।

मनसव प्राप्त करने वाले व्यक्ति को मीरवख्शी सर्वप्रथम सम्राट के सामने पेश करता था। दोनों मिलकर उसकी योग्यता पर विचार करते थे। राजभक्ति आदि की दृष्टि से योग्य पाए जाने पर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज कर लिया जाता था। मनसबदार की पदोन्नति भी सम्राट की मर्जी पर निर्भर थी। 

 इसके साथ ही वह सम्राट की इच्छा तक ही अपने पद पर कार्य कर सकता था मनसबदार का पद पैतृक नहीं था। मनसबदार की मृत्यु के पश्चात उसका पद उसके पुत्र को न प्राप्त होकर छीन लिया जाता था। उसकी मृत्यु के पश्चात या हटाये जाने पर उसकी सम्पत्ति भी ले ली जाती थी। Mansabdari System in hindi

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मनसबदारों का विभाग |Department of Mansabdari

अकबर के शासनकाल में मनसबदारों का एक अलग विभाग होता था। यह विभाग मनसबदारों की नियुक्तियाँ पदोन्नति, सेवावृति का हिसाब स्वयं रखता था। उसकी उन्नति, अवनति या पद से हटाना सम्राट के द्वारा किया जाता था। सेना पर पर्याप्त नियंत्रण रखा जाता था। सेना को नियंत्रित करने के लिए दागमहली की व्यवस्था की गयी थी। इसका कार्य हाथी, घोड़ों को दगवाना तथा उनका रिकॉर्ड रखना था।

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जात एवं सवार |Zat and Sawar

जात और सवार को लेकर विद्वानों में मतभेद है। एस. के. शैव के अनुसार पैदल सेना को 'जात' और घुड़सवार सेना को 'सवार' कहते थे। इरविन का कथन है, "सवार पद एक अतिरिक्त सम्मान था तथा पद या ओहदा दिया जाता था उसे जात से सूचित किया जाता था जात के अलावा जितने सैनिक होते थे। 

उस संख्या का बोध 'सवार' शब्द से होता। इसी प्रकार डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी का कहना है, इस शब्द से उस वेतन का बोध होता है, जो किसी अधिकारी को उसके वेतन के अलावा दिया जाता था। डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार, “अकबर ने सवार का पद अपने शासन के अंतिम वर्षों में शुरू किया था, जबकि दक्षिण के युद्धों में उसे मनसबदारों का वेतन बढ़ाने की आवश्यकता महसूस हुई। मनसबदारी व्यवस्था की विशेषताएं

परंतु इन विद्वानों के विचारों से जात और सवार का पूर्ण स्पष्टीकरण नहीं होता। यह सही है कि अकबर को बाद में जात और सवार के आधार पर विभाजित करने की आवश्यकता महसूस हुई। वस्तुतः अनेक मनसबदारों को जितना मनसव प्राप्त होता था। उसके अनुसार सेना नहीं रखते थे। इसलिए अकबर ने उन्हें जात और सवारों में विभाजित "कर दिया। जितनी संख्या में कोई मनसबदार सेना रखता था या उसकी सामर्थ्य थी उसे जात कहा जाता था। परंतु प्रयोग में या व्यवहार में जितनी सेना रखता था उसे सवार कहा जाता

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मनसबदारों की श्रेणियाँ |Catagories of Mansabdars

मनसबदारों का विभाजन दो प्रकार से किया जा सकता है

I. संख्या के आधार पर सबसे छोटा मनसबदार 10 मनसब का होता था। सबसे बड़ा मनसबदार अकबर के काल में 12000 का और शाहजहाँ के समय 60,000 का था। अबुल फजल के अनुसार मनसबदारों की 66 श्रेणियाँ थीं। अकबर के शासन काल में 7,000 का मनसब अमीरों और उसके ऊपर राजकुमारों को दिये जाते थे।

II. जात और सवार के आधार पर: इस आधार पर मनसबदारों मनसबदारों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था

  1. प्रथम श्रेणी (First Grade) : इस श्रेणी के मनसबदार का जात और सवार बराबर होता था।
  2. द्वितीय श्रेणी (Second Grade): इसमें मनसब सवार, जात के मनसब से आधे से अधिक होता था।
  3. तृतीय श्रेणी (Third Grade): इस श्रेणी में मनसबदारों का सवार जात के आधे से कम होता था।

मनसबदारों का वेतन और भत्ता|Pay and allowances of Mansabdars

जागीरदारों के विपरीत मनसचदारों को नकद वेतन दिया जाता था। उनका वेतन निश्चित था। इनके बिल को मीर बख्शी पास करता था। इसी वेतन में ये अपना और सेना का खर्च चलाते थे।

मनसबदारों की सेना का निरीक्षण |Inspection of Army of Mansabdars

समय-समय पर मनसबदारों की सेना का निरीक्षण किया जाता था। उन्हें सभी सैनिकों का हुलिया रखना पड़ता था जिससे भागे हुए या गायब हुए सैनिकों की खोज की जा सकें। घोड़ों और हाथियों को दगवाना पड़ता था जिससे अच्छे घोड़ों और हाथियों को बदला न जा सके। सम्राट के आदेशानुसार मनसबदारों को सैनिक अभियानों में जाना पड़ता था। इन सबका पालन सख्ती के साथ किया जाता था।

मनसबदारी प्रथा के गुण या लाभ |Merits of Mansabdari System

 इस सैनिक प्रणाली से कई लाभ हुए

  1. मनसबदार अपना वेतना सम्राट से प्राप्त करते थे इसलिए वे सम्राट के प्रति विश्वासपात्र होते थे। जागीरदारों के समान वे आसानी से विद्रोह नहीं कर सकते थे।
  2. इसके द्वारा की वृद्धि हुई। जागीरदारी प्रथा में जागीरदार पूरी जागीर की सम्पत्ति का उपयोग करता था। जिससे पर्याप्त आर्थिक हानि होती थी। इसके अलावा मनसबदार की मृत्यु के पश्चात मनसबदार की सारी सम्पत्ति छीन ली जाती थी।
  3. मनसबदारों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर होती थी। इसलिए वे काम अच्छी प्रकार से करते थे। उनके अयोग्य पुत्र को मनसबदार नहीं बनाया जाता था। 
  4. कला और साहित्य के क्षेत्र में भी मनसब दिये गये। इसलिए कला और साहित्य की भी खूब उन्नति हुई।
  5. सेना का प्रबंध एक उलझनपूर्ण कार्य था। इसके कारण मुगल सम्राट अनेक उलझनों से बच जाता था।

मनसबदारी प्रथा के दोष |Demerits of Mansabdari System

अकबर के काल में इस प्रणाली से अनेक लाभ हुए परंतु आगे चलकर यह दूषित हो गयी। इसमें निम्नलिखित दोष आ गये थे

  1. मनसबदार स्वार्थी और बेईमान होते थे। वे अपनी सेना में अच्छे सैनिकों को नहीं रखते थे। 
  2. सैनिकों का वेतन आदि सुविधायें मनसबदारों से प्राप्त होती थीं इसलिए वे उसके प्रति विश्वासपात्र होते थे न कि सम्राट के प्रति ।
  3. मनसबदार विभिन्न जातियों और वर्गों के होते थे इसलिए उनमें आपस में ईर्ष्या की भावना होती थी। 
  4. इनका सैनिक संगठन अच्छा नहीं होता था।
  5. मनसबदारों के स्थानान्तरण की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए भ्रष्टाचार बढ़ रहा था।
  6. मनसबदार सेना के अच्छे घोड़ों को बेच देते थे। और उसके स्थान पर खराब घोड़े दिखा देते थे।
  7. वे सैनिकों के वेतन का वितरण उचित ढंग से नहीं करते थे। 
  8. मनसबदारों की गोला-बारूद की व्यवस्था अच्छी नहीं होती थी।

इस प्रकार मनसबदारी प्रथा में अनेक दोष आ गये थे। इसका चित्रण करते हुए तत्कालीन इतिहासकार बदायूँनी ने लिखा है-"किसी प्रकार सरदार को धोखा देते हुए मनसबदार निरीक्षण के लिए बाजार से आदमियों को पकड़ लाते थे और उन्हें फौजी वर्दी पहनाकर सैनिकों के रूप में ला खड़ा कर देते थे और रिश्वत देकर निरीक्षण में सफल हो जाते थे। सैनिक विभाग की ओर से दिये गये बढ़िया घोड़ों की जगह कमजोर घोड़ों को ला खड़ा करना तो साधारण सी बात थी।

Conclusion

तो प्रिय पाठक अब आपको इस चीज का ज्ञान हो गया होगा की मनसबदारी व्यवस्था क्या है,Mansabdari System in hindi,मनसबदारी प्रणाली का क्या अर्थ है मनसबदारी प्रथा के गुण या लाभ,मनसबदारी प्रथा के दोष आदि विषय के बारे में जानकारी मिली है। 

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